भजन

भजन

विद्या ही परम धन है नरका, संग्रह है जीवन भरका ॥ टेक ॥।

धन-सत्ता-तन धोखा खावे, विद्या साधन इहपरका ||१||

सब सुंदरमें सुंदर विद्या, काम नही जहाँ जावे मानही पावेगा, प्रेम करे

उसको डरका ॥२॥ जन्म अनेक बीते बदलाकर, विद्या नही भुल सरका ॥३॥

परके घरका ||४|| विद्या हीन पशु कहलावे, पात्र नही व आदरका ||५|

तुकड्यादास कहे सद्गुण हो, रहे भवसागरका ॥६॥

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